रिया चक्रवर्ती और रामराज्य

 रिया चक्रवर्ती और रामराज्य 

इसे कोविड -19 की कई मेहरबानियों में से एक मेहरबानी के रूप में ही देखा जाना चाहिए कि इस महान देश के निवासियों ( सभी को नागरिक कहने में अभी लोचा ) को एक आदर्श पुरुष और एक आदर्श शासक भगवान राम के आदर्श चरित्र के पुनरावलोकन का अवसर प्राप्त हुआ | जी हाँ मेरा आशय टीवी के सुप्रसिद्ध धारावाहिक रामानंद सागर कृत रामायण और उत्तर रामायण से है जिसका पुनर्प्रसारण किया जा रहा है , 7 अगस्त को अभी प्रसारित किये जा रहे उत्तर रामायण के एपिसोड को देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ जिसे देखने के बाद अनायास ही रामराज्य की अवधारणा आँखों के आगे तैरने लगी जिसकी कल्पना और साकार होते देखने की चाह प्रत्येक भारतीय सदियों से मन में संजोये बैठा है | क्योंकि सन्दर्भ रामराज्य का है इसलिए रामायण के तथ्यों पर नहीं जाऊंगा क्योंकि इस वर्णन के समय भगवान् राम राजा नहीं थे ,उत्तर रामायण की ही और विशेषकर इसी घटना पर फोकस करूँगा जिसमे भगवान् राम अयोध्या के राज सिंहासन पर बतौर शासक विराजमान है और महर्षि विश्वामित्र माता सीता को लेकर राम दरबार में पहुंचकर भगवान् राम से सीता माता को स्वीकार करने का आग्रह करते है | इस एपिसोड में वर्णित घटना की ऐतिहासिकता की बात भी में यहाँ नहीं करूँगा क्योंकि ये सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था से जुड़ा मसला है और ठीक इसी आस्था के साथ रामराज्य भी हमारे मन में हमारे विचारो में मौजूद है और ये तो आशा की ही जा सकती है कि रामानंद सागर ने जब इस घटना को फिल्माया होगा तो उन्होंने उपलब्ध पौराणिक ग्रंथो से सन्दर्भ अवश्य लिया होगा | 
                        राम दरबार में भगवान् राम राज सिंहासन पर विराजमान है और माता सीता साधारण वस्त्रो में एक साधारण नारी की तरह आँखों में अश्रु लिए अपने दोनों पुत्रो के साथ एक ऐसे अपराधी की भाँती खड़ी है जिसे निर्दोष होने के बावजूद बरसो तक दंड भुगतना पड़ा और वो चाहती थी कि अब तो उसकी सजा का अंत हो | महर्षि विश्वामित्र माता सीता के सुचरित्र की मजबूत  वकालात करते हुए राजा राम से आग्रह करते है कि वे सीता माता को स्वीकार करे | राजा राम इस पर स्वयं भी सीता माता के सुचरित्र की गवाही देते है पर साथ ही ये भी कहते है कि सीता को जिस अपराध के लिए दण्डित किया गया था वो मुद्दा जनसमुदाय से निकलकर आया था और अब जबकि सीता को स्वीकार करने वाली बात है तो इसका निर्णय भी जनसमुदाय ही करेगा | राजा राम के इस निर्णय से  बुरी तरह आहत माता सीता अश्रुपूरित नेत्रों के साथ राम दरबार में दो कदम आगे आती है और धरती माता से मार्मिक निवेदन करते हुए कहती है कि यदि मेने अपने पूरे जीवन में श्रीरघुनाथ के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का विचार तक भी नहीं लाया हो तो है धरती माँ मुझे इसी समय अपनी आगोश में समा लो | चंद मिनिटो के इस सीन को हम लोग केवल मनोरंजन की दृष्टि से ही देखते है जबकि मेरी राय में इसपर गहन मंथन और चिंतन होना चाहिए क्योंकि ये इस तथ्य को प्रदर्शित करता है कि जिस रामराज्य की बात हम करते है वो वस्तुत कैसा था और वर्तमान परिवेश में क्या इसे लागू कर पाना संभव है और लागू कर भी दिया गया तो उसका सामाजिक और राजनैतिक प्रभाव किस तरह का होगा | 
                    चलिए जान लेते है रामराज्य को ,रामायण में ही ये भी वर्णित है कि लंका से लौटने के बाद माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी जिसके बाद एक आदर्श पति राम उनकी सुचरित्रता और निर्दोषिता से बखूबी वाकिफ थे लेकिन यही आदर्श पति राम जब एक आदर्श शासक राम के रूप में स्थापित किये गए तो उन्होंने केवल एक अफवाह के आधार पर माता सीता की निर्दोषिता को भलीभांति जानते हुए भी दंड दिया वो भी  बिना उनका पक्ष सुने ,फिर लम्बी अवधि तक दंड भुगत लेने के बावजूद भी जब इसके शमन की बारी आयी तब भी राजा राम ने खुद कोई निर्णय नहीं लेते हुए निर्णय जनता पर छोड़ दिया और माता सीता को एक और परीक्षा देने पर  मजबूर कर दिया | तो क्या हमें ऐसा रामराज्य चाहिए जिसमे हमेशा केवल नारी को ही परीक्षाओ से गुजरना पड़े ,निर्दोष होते हुए भी नारी को बार बार अपनी निर्दोषिता साबित करना पड़े ,वास्तविक तथ्यों से अवगत होने के बावजूद राजा केवल अफवाहों के आधार पर ही नारी को मानसिक प्रताड़ना की आग में धकेल दे और उसका पक्ष सुने तक नहीं ,जिसमे नारी केवल दिखाने के लिए ही पूजनीय हो लेकिन व्यवहार में उसे दोयम दर्जे की समझा जाए जिसे हर कदम पर इस पुरुष सत्तात्मक समाज में अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़े | यदि यही रामराज्य है तो माफ़ कीजियेगा नारी को मन और आचरण दोनों से समानता का दर्जा देने का प्रबल पक्षधर  मै  ऐसे रामराज्य को स्वीकार नहीं करता | रामराज्य का दूसरा अहम पहलू है जनता की राय ( मत ) बेशक वो अफवाह ही हो राजा उसे सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और उसी के अनुरूप शासन चलाता है | तो क्या रामराज्य लागू करने के बाद ये सुनिश्चित हो जाएगा कि अब हमारे वोटो से जीतकर जानेवाला विधायक या सांसद अपने निजी स्वार्थ और महत्वाकांक्षाओं के अधीन होकर हमसे विश्वासघात नहीं करेगा ,तो क्या ये सुनिश्चित हो जाएगा कि शासन उसी तरह के निर्णय लेगा ,योजनाए बनाएगा या नियम कानून बनाएगा जो जनता चाहेगी अपना निजी अजेंडा जनता पर नहीं थोपेगा ,तो क्या ये सुनिश्चित हो जाएगा कि एक पूरे समुदाय द्वारा नहीं बल्कि केवल एक व्यक्ति द्वारा भी कोई मुद्दा उठाया गया तो शासन उस मुद्दे को संज्ञान में लेगा और तदनुसार कदम भी उठाएगा | बेशक यदि रामराज्य में ये सब होना है तो भला कौन ऐसे रामराज्य को नहीं चाहेगा पर क्या हमारे राजनैतिक दल और अति महत्वाकांक्षी नेता ,येन केन अपनी पोषित नीतियों को लागू करने में जुटी सरकारे क्या ऐसा रामराज्य स्थापित होने देंगी | कभी भी नहीं उन्हें तो रावण राज चाहिए जिसमे राजा अर्थात शासन ही सर्वोपरि है फिर बेशक रावण अपने दम्भ में अपने कुनबे का ही नहीं बल्कि लंका के नागरिको का भी सर्वनाश क्यों न करवा दे | 
                   अब आप कहेंगे कि रामराज्य में रिया चक्रवर्ती की एंट्री क्यों कर हुयी तो दरअसल ये भी तो भारत में सदियों पहले ही स्थापित हो चुके रामराज्य के पुरुष सत्तात्मक भाग के क्रम में ही है जिसमे अब तक न जानी कितनी नारियो को अपनी निर्दोषिता प्रमाणित करने के लिए संघर्ष करना पड़ा ,एक ऐसा संघर्ष जिसमे सफलता का प्रतिशत किसी भी सभ्य समाज में सराहनीय तो नहीं कहा जा सकता | आपको स्मरण होगा कि सुशांत सिंह की आत्महत्या के लिए शुरू में नेपोटिज्म ( भाई भतीजावाद ) को जिम्मेदार ठहराया गया था और जांच एजेंसियों ने एक एक करके कई फ़िल्मी हस्तियों से पूछताछ की थी और तब जब कि नेपोटिज्म के कलंक के रूप में इस अध्याय का पटाक्षेप होने वाला था कि अचानक सुशांत सिंह के पिता को देवीय प्रेरणा से रिया चक्रवर्ती के रूप में एक ठोस कारण मिला और रामराज्य का पुरुष सत्तात्मक भाग जाग्रत हो गया ,वो भाग जो अपने पति के सुख दुःख में खुद को बराबर की साझीदार मानते हुए माता सीता के महलो की सुख सुविधा छोड़कर वन गमन को याद ही नहीं रखना चाहता क्योंकि पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी का तो फर्ज ही यही है लेकिन अशोक वाटिका से लौटकर आने वाली सीता के चरित्र पर लांछन लगाने में जरा भी नहीं हिचकता ,ये वो समाज है भगवान् राम के साथ वन में जाने पर एक आदर्श भाई के रूप में तो लक्ष्मण की खूब सराहना करता है लेकिन उस उर्मिला का जिक्र तक करने से गुरेज करता है जिसने 14 वर्ष पति के विरह में बिठाये | कारण स्पष्ट है हमारे समाज ने नारी को हमेशा दोयम दर्जे पर रखा ,नारी को हमेशा उपभोग की एक वस्तु समझा जिसकी अपनी कोई इच्छा नहीं हो सकती उसे केवल पुरुष के आदेशों का पालन करना होता है ,और यदि किसी नारी ने इस लक्ष्मण रेखा को लांघने का साहस किया तो फिर नारी की वो परिभाषा सामने आती है जिसमे वो चरित्रहीन ,केवल पैसे के कारण ही किसी पुरुष से प्रेम का नाटक करने वाली और यहाँ तक कि लालच में अंधी होकर अपने प्रिय की हत्या तक से गुरेज नहीं करने वाली होती है | इतिहास गवाह है कि उसमे नारी के नकारात्मक रूप को ही  और तमाम बुराइयों के बावजूद भी पुरुष के सकारात्मक रूप को ही प्रदर्शित किया है | 
                        में नहीं जानता कि क्या रिया चक्रवर्ती की आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब थी की उसे किसी अमीर जादे को फांसने की जरुरत पड़ती ,में नहीं जानता कि रिया चक्रवर्ती इतनी खूबसूरत थी या नहीं कि उसे सुशांत सिंह से अधिक अमीर व्यक्ति प्रेमजाल (कथित ) में फंसाने के लिए मिलता या नहीं लेकिन  उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इतना जरूर समझ में आता है कि वो लम्बे समय से सुशांत सिंह के साथ लिव इन रिलेशनशिप में थी जिससे ये तो जाहिर हो ही जाता है कि वे दोनों एक  दूसरे से बेइन्तेहाँ मुहब्बत करते रहे होंगे अन्यथा लिव इन रिलेशनशिप का लम्बा चलना मुमकिन ही नहीं है ,चलिए इसके दूसरे पहलू पर भी विचार कर लेते है कि ये रिलेशनशिप दोनों की जरुरत थी तो फिर यदि सुशांत सिंह ने रिया की किसी जरुरत को पूरा किया तो उस पर प्रश्नचिन्ह क्यों और दूसरी बात रिया क्यों कर चाहेगी की उसकी जरुरत पूरी करने वाला जरिया समाप्त हो जाये | दोनों ही स्थिति में  सुशांत की मौत से यदि मानसिक और आर्थिक रूप से किसी का सर्वाधिक नुकसान होना है तो वो रिया चक्रवर्ती है | लेकिन बात फिर वही आती है कि उर्मिला की  विरह पीड़ा का जिक्र तक नहीं करने वाला हमारा समाज अपने प्रिय को खोने से उपजी रिया की पीड़ा को क्योंकर समझना चाहेगा | एक और बड़ा कारण नस्ल तथा क्षेत्र का है ,रिया चक्रवर्ती बंगाली है और आर्याव्रत के उस क्षेत्र से आती है जिसे लाखो वर्ष  पहले त्रेता युग में  भगवान् राम के अवतरण के समय भी अच्छी निगाहो से नहीं देखा गया और 15 वी सदी में सरयू के तट पर बैठकर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गयी प्रभु राम की रामचरित मानस के समय भी सराहना नहीं मिली तो आज जबकि पूरा देश राममय है क्योंकर बंगाल और बंगाली नस्ल को हिकारत भरी नजरो से क्यों नहीं देखा जाएगा |  आलेख को कन्क्लूड करते हुए एक और महत्वपूर्ण बात कहना चाहूंगा और वो ये कि किसी भी संवेदनशील मामले में सम्बंधित पक्षों को मिडिया में बयानबाजी से दूर रहने के निर्देश कोर्ट द्वारा दिए जाते है और मीडिया चेनलो से भी ये अपेक्षा की जाती है कि वे लीगल प्रोसीडिंग्स के दौरान किसी सार्वजनिक डिबेट से बचेंगे | लेकिन ये पहला मामला भी नहीं है जिसमे मीडिया ट्रायल हो रही है और वो भी सिर्फ अफवाहों के आधार पर , तो क्या ये कोर्ट ट्रायल के समान्तर ट्रायल नहीं है जिस पर सख्ती से कार्यवाही किये जाने की जरुरत है | और यदि कोर्ट को ये लगता है कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है जिस पर मीडिया रेगुलेटरी  ही निर्णय लेगी तो क्या गाँवों में ,समाजो में और खाप पंचायतो में होने वाले कथित ट्रायल्स पर भी कोर्ट का रुख ऐसा ही रहेगा | 
महेंद्र  जैन 
8 अगस्त 2020 
( नोट -इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार है जिनसे सहमत होना आपके लिए कतई जरुरी नहीं है )      

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